निर्जला एकादशी व्रत की हिंदू धर्म में बहुत मान्यता है। ये व्रत हर साल मई माह के आखिर में या जून माह में आता है। यह व्रत हिंदू कैलेंडर के ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को मनाया जाता है। इस दिन व्रत रखने से धन, समृद्धि, स्वास्थ्य, लम्बी आयु और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
निर्जला एकादशी का व्रत बहुत कठिन माना जाता है। निर्जला एकादशी का नाम संस्कृत भाषा के शब्द "निर्जला" के नाम पर रखा गया है जिसका अर्थ होता है "पानी के बिना"। इसका मतलब यह है कि जो भी इस व्रत को रखते हैं वे पूरे दिन और रात में भोजन या पानी का सेवन नहीं करते हैं।
आमतौर पर निर्जला एकादशी गंगा दशहरा के बाद आती है परन्तु कई बार ग्रह गणना के अनुसार दोनों एक ही दिन हो सकती हैं। निर्जला एकादशी के व्रत को धारण करने वाले जातक को गंगा दशहरा से ही तामसी भोजन अर्थात तीखे और खट्टे भोजन से परहेज कर लेना चाहिए।
निर्जला एकादशी का महत्व
निर्जला एकादशी हिंदू पौराणिक कथाओं में बहुत महत्व रखती है और उपवास और तपस्या के लिए बहुत ही शुभ दिन माना जाता है। निर्जला एकादशी के दिन स्वयं को शुद्ध करने और आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने का एक तरीका माना जाता है।
हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित है जो जगत के संरक्षक और पालनहार हैं। भगवान विष्णु को पृथ्वी को बुरी शक्तियों से बचाने के लिए विभिन्न रूपों में अवतार लेने के लिए जाना जाता है। भक्तों का मानना है कि निर्जला एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और उनका आशीर्वाद मिलता है।
निर्जला एकादशी के अन्य नाम
निर्जला एकादशी को ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी, पांडव भीम एकादशी, भीमसेन एकादशी, पांडव निर्जला एकादशी, पांडव एकादशी और भीम एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
निर्जला एकादशी 2026 का शुभ मुहूर्त
- निर्जला एकादशी तारीख: 25 जून 2026, गुरुवार
- एकादशी तिथि प्रारंभ: 24 जून 2026, सायंकाल 06:12 बजे
- एकादशी तिथि समाप्त: 25 जून 2026, सायंकाल 08:09 बजे
- व्रत का दिन: उदयातिथि के अनुसार 25 जून 2026 को
- पारण का समय: 26 जून 2026, सुबह 05:25 बजे से 08:13 बजे तक
निर्जला एकादशी पूजा सामग्री
निर्जला एकादशी की पूजा के लिए आपको निम्न सामग्री की आवश्यकता होगी:
- भगवान विष्णु का चित्र या मूर्ति
- पीले फूल, फल, मिठाई, नारियल
- धूप, कपूर, दीपक, देसी घी
- पंचामृत, पान, सुपारी, लौंग, चंदन, अक्षत
- तुलसी के पत्ते - ध्यान दें: तुलसी पत्र एकादशी से एक दिन पहले ही तोड़ कर रख लें
एकादशी के दिन तुलसी पत्ते क्यों नहीं तोड़ने चाहिए?
भगवान विष्णु को तुलसी अत्यंत प्रिय है और विष्णु जी की पूजा तुलसी पत्र के बिना अधूरी मानी जाती है। पौराणिक शास्त्रों के अनुसार माता तुलसी का विवाह देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु से करवाने की परंपरा है। माता तुलसी हर एकादशी के दिन भगवान विष्णु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं।
ऐसे में निर्जला एकादशी के दिन तुलसी को अगर जल दिया जाता है तो इससे उनका व्रत खंडित हो जाएगा और तुलसी पत्ते तोड़ने से उनका ध्यान भी भंग होगा। इसलिए एकादशी के दिन तुलसी को जल देना और तुलसी पत्र तोड़ना मना किया जाता है। ग्रहण के समय और सूर्यास्त के बाद भी तुलसी को जल देना या पत्ते तोड़ना वर्जित है।
निर्जला एकादशी व्रत विधि
- निर्जला एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और साफ, पीले वस्त्र धारण करें।
- घर के मंदिर में देसी घी का दीपक जलाएं।
- गंगाजल से भगवान विष्णु का अभिषेक करें और उन्हें पीले फल, फूल और तुलसी पत्र अर्पित करें।
- निर्जला एकादशी व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- दिनभर ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें और रात्रि जागरण करें।
- द्वादशी के दिन शुभ मुहूर्त में व्रत का पारण करें।
निर्जला एकादशी व्रत कथा
निर्जला एकादशी से जुड़ी सबसे लोकप्रिय कथा महाभारत के पांच पांडव भाइयों में से एक महाबली भीमसेन की है। भीमसेन अपनी अतृप्त भूख के लिए जाने जाते थे। वह एक ही बार में बहुत अधिक मात्रा में भोजन ग्रहण कर सकते थे। हालांकि, वह भोजन और पानी की शारीरिक आवश्यकता के कारण अन्य एकादशी के व्रतों का पालन नहीं कर सके।
एक बार ऋषि वेदव्यास पांडवों का हाल जानने उनके घर पहुंचे। बातचीत के दौरान भीम ने ऋषि वेदव्यास से कहा कि माता कुंती, भाई युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल और सहदेव सब मुझे एकादशी को व्रत रखने को कह रहे हैं, परंतु मैं अपनी भूख के कारण ऐसा नहीं कर पा रहा। कृपया कोई उपाय बताएं।
ऋषि व्यास ने भीमसेन से कहा कि वह निर्जला एकादशी का व्रत कर सकते हैं। क्योंकि निर्जला एकादशी को सबसे बड़ी और सर्वश्रेष्ठ एकादशी माना जाता है और इस एक एकादशी को नियम पूर्वक व्रत करने से साल की सभी 24 एकादशियों का फल मिलता है।
भीमसेन ऋषि वेदव्यास के कहे अनुसार निर्जला एकादशी के व्रत का पालन करने के लिए सहमत हुए और पूरे दिन-रात भोजन और पानी से परहेज किया। भगवान विष्णु उनकी भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्हें अन्य सभी एकादशी व्रतों के समान लाभ प्रदान किया। तभी से इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है।
निर्जला एकादशी का पारण
पारण का अर्थ होता है उपवास तोड़ना। एकादशी व्रत के अगले दिन अर्थात द्वादशी तिथि को सूर्योदय के बाद एकादशी व्रत का पारण करने का विधान है। द्वादशी तिथि को ही पारण किया जाना आवश्यक है क्योंकि द्वादशी पर पारण न करना अपराध के समान माना जाता है और एकादशी व्रत का फल प्राप्त नहीं होता।
पारण नियम: पारण से पहले ब्राह्मण को भोजन कराएं और दान-दक्षिणा दें। फिर स्वयं अन्न ग्रहण करके व्रत खोलें।
कैसे करें निर्जला एकादशी का पालन
निर्जला एकादशी को हिंदू धर्म को मानने वाले लोग बड़ी भक्ति और अनुशासन के साथ मनाते हैं। इस दिन भक्त भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और उनका आशीर्वाद लेने के लिए ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करते हैं।
निर्जला एकादशी के व्रत के दौरान, भक्त किसी भी भोजन या पानी का सेवन नहीं करते हैं। जो लोग पूर्ण उपवास करने में असमर्थ हैं, वे एक समय फलाहार कर सकते हैं। इसमें फल, दूध या दूध से बनी वस्तुओं का सेवन किया जा सकता है।
निर्जला एकादशी का उपवास अगले दिन द्वादशी तिथि को सूर्योदय के बाद पारण मुहूर्त में समाप्त होता है। भक्त भगवान विष्णु को भोग लगाकर प्रसाद से अपना उपवास तोड़ते हैं। प्रसाद में फल, मिठाई और सात्विक भोजन शामिल होता है।
निर्जला एकादशी व्रत के लाभ
- निर्जला एकादशी व्रत के प्रभाव से भगवान श्री विष्णु की कृपा बनी रहती है और घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है।
- इस व्रत को रखने वाले जातकों को जाने-अनजाने पापों से मुक्ति मिलती है।
- संतान सुख, दांपत्य सुख और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।
- जीवन में धन, स्वास्थ्य, दीर्घायु मिलती है और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।
- साल की सभी 24 एकादशियों का पुण्य केवल इस एक व्रत से मिल जाता है।
निष्कर्ष
निर्जला एकादशी एक महत्वपूर्ण पर्व है जिसे दुनिया भर के हिंदू बड़ी भक्ति, श्रद्धा और अनुशासन से मनाते हैं। यह उपवास और तपस्या का दिन है जो आत्मा को शुद्ध करता है और आध्यात्मिक ज्ञान देता है। इस व्रत के लिए अपार इच्छाशक्ति चाहिए, लेकिन यह धन, स्वास्थ्य और दीर्घायु जैसे महान लाभ प्रदान करता है।
निर्जला एकादशी का व्रत जगत के पालनहार भगवान विष्णु का आशीर्वाद पाने का सबसे उत्तम तरीका है। यह त्योहार हमें अनुशासन, भक्ति और आत्म-नियंत्रण का महत्व सिखाता है, जो एक सार्थक जीवन जीने के लिए आवश्यक है।
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